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यौनिक गंदगी: दो शब्द और!!
August 21, 2008 | 4 Comments
मेरे कई मित्रों ने मेरे पिछले लेख बढती हुई यौनिक गंदगी! पर दिलचस्प एवं चितनीय टिप्पणियां दीं जिनके लिये मैं आभारी हूँ. उनकी टिप्पणियों के संदर्भ में मुझे कुछ बातें और कहनी हैं: शास्त्री जी यह हरि अनंत हरि कथा अनंता जैसा ही अंतहीन विवाद है -यौन भावना मनुष्य की प्रबलतम जैवीय भावनाओं में से है -लाख जतन करो तब भी यह अपना आउटलेट खोज ही लेगी — इस पर शिक्षा आदि पैसे की बर्बादी है. Dr.Arvind Mishra डा अरविंद ने सही कहा है कि काम भावना अपना आउटलेट खोज लेगी. लेकिन मेरा उद्देश्य इस आउटलेट को नकारना नहीं है. मैं तो भारतीय यौन अवधारणा का प्रचारक हूँ जहां ( पानी को बांध में संगृहीत कर नियंत्रित तरीके से पनबिजली को उत्पन्न करने के समान) कामवासना को नियंत्रण में रख कर सही दिशा में उसके बहाव को मोडने को हर तरह का धार्मिक, नैतिक, एवं सामाजिक प्रोत्साहन दिया जाता है. अपने लेख बढती हुई यौनिक गंदगी! में मैं ने इस विषय में पाठको को चेतावनी देने की कोशिश की है कि आपराधिक तत्व इस बहाव को गलत दिशा में ले जाने की एक "नवीन" कोशिश कर रहे हैं को इसके पहले नहीं हुआ करता था, एवं इसका परिणाम हम सब की सोच से अधिक विध्वंसक होगा. इस पर और अधिक प्रकाश अगले लेखों में डालूँगा. मानसिक विकृति बहुत व्याप्त है। शायद सभी पीढ़ियों में है।Gyan Dutt Pandey ज्ञान जी सही कहते हैं कि मानसिक विकृति बहुत व्याप्त है, एवं सभी पीढियों में है. लेकिन मेरा इशारा उस ओर नहीं है. सवाल विकृति का नहीं है. यौनिक विकृतियां हर समाज में पाई जाती हैं, लेकिन भारतीय यौनोत्तेजक (पोर्नोग्राफिक) साहित्य में एक नया मोड आया है जो परिवारों के भीतर ही भीतर यौनिक अपराधों को जन्म दे रहा है. यह एक खतरनाक विकास है एवं हम सब को इसके विरुद्ध (कम से कम अपने अपने परिवारो में) जुटना होगा. इसका विश्लेषण अगले चिट्ठे में दूंगा. बहुत सही कहा आपने शास्त्री जी. हकीकत यही है, फिर भी हम विरोध करना है के लिये विरोध तो करते हैं लेकिन असलियत स्वीकारने से डरते हैं. एक ओर हम मस्तराम को पढ़ते हैं दूसरी ओर सामने आकर उसका विरोध करते हैं. आखिर हम एक मुहिम चला कर क्यों नहीं इन जैसी अश्लील ब्लागों को फ्लैग करने का अभियान चलाते. Ramashankar Sharma रमाशंकर जी सही कहते हैं, एवं इस तरह के एक मानसिक-सामाजिक नैतिक आंदोलन को मन मे रख कर ही मैं ने इन दिनों यह कठिन विषय चुना है. उम्मीद है कि इन लेखों के द्वारा कई लोग विषय की गंभीरता को समझेंगे एवं आप जैसे आंदोलन की बात कर रहे हैं उससे जुडेंगे. इस बीच दिनेश जी ने मेरे मन की बात कह दी है जो इस प्रकार है: यौन शिक्षा का उद्देश्य ही यौन जिज्ञासा को भटकाव से रोकना होना चाहिए। इस के लिए एक सही दिशा में ले जाने वाली यौन शिक्षा जरूरी है। यह पारंपरिक अर्थात परिवार में ही प्राप्त हो सके तो सर्वोत्तम होगी। दिनेशराय द्विवेदी अगले चिट्ठे में असली समस्या का खुलासा करने की कोशिश करूंगा.
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क्रेडिट कार्ड: मेरा पहला कडुआ अनुभव
August 20, 2008 | 11 Comments
[Bad Service By Centurion Bank of Panjab] कुछ महीने पहले सेंचुरियन बेंक से दो जवान लोग मेरे घर बिन बुलाये पधारे. काफी मिन्नतें की कि एक क्रेडिट कार्ड ले लूँ. आखिर सेंचुरियन बैंक का एक मिरेकिल कार्ड ले लिया. थोडाबहुत पैसा खर्च किया. जब पैसे की सूचना आई तो मैं घर पर नहीं था, एवं तारीख निकल गई. कंपनी ने पुन: सूचना भेजी. समय आने पर मैं ने किसी तरह की शिकायत किये बिना पैसा एवं विलंब शुल्क भेज दिया. लेकिन बैंक ने लगभग 2 महीने या अधिक के बाद उस चेक को बेंक भेजा. इस तरह विलम्ब पर विलम्ब होता गया. अंत में मजे की बात यह है कि पैसा मेरे खाते से निकलने के लगभग 10 दिन बाद मुझे नोटिस मिला कि पैसे का भुगतान नहीं किया गया है अत: लगभग 500 रुपये से अधिक जुर्माना भरूं एवं मूल पैसा भी भेजूं. दोचार फोन करने के बाद उन्होंने मान लिया कि गलती उनकी है, पैसा मिल चुका है, लेकिन सजा मुझे भुगतनी पडेगी. सजा के रूप में उन्होंने मेरा कार्ड रद्ध कर दिया एवं कहा कि अब चाहिये तो लिखित में आवेदन करो. मै ने कह दिया, "जी धन्यवाद. जो बैंक चेक मिलने के ढाई महीने बाद मेरे खाते से पैसा निकालता है, एवं बाद में लेटलतीफी की सजा मुझे देता है, एवं जब उनसे प्रश्न पूछा जाता है तो फोन कनेक्शन काट दिया जाता है, उनका कार्ड नहीं चाहिये". दूसरी ओर मेरे पास सिटिबेंक का कार्ड है. यदि उनको आप चेक भेज दें तो जिस दिन उनके हाथ लगता है उसी दिन उसे पावती के रूप में नोट कर लिया जाता है. अब पैसा 2 दिन में उनको मिले या दो महीने में, वे कभी इसका दोष ग्राहक को नहीं देते. इतना ही नहीं, यदि ग्राहक को पैसा देने में देरी होती है तो वे बहुत ही शालीनता से पूछते हैं कि क्या चेक प्राप्त करने के लिये ग्राहक के घर पर किसी को भिजवा दिया जाये. यदि हां करें तो आदमी आता है, न कहें तो नहीं आता है. इतना ही नहीं यदि बैंक की गलती से ग्राहक द्वारा दिये गये चेक के भुनाने में कोई देरी हो जाती है तो बैंक कभी भी अपनी गलती को ग्राहक पर नहीं थोपता. मैं अनुभव के आधार पर सिटिबेंक के क्रेडिट कार्ड का अनुमोदन करता हूँ एवं सबसे निवेदन करता हूँ कि जब तक सेंचुरियन बैंक अपना रवैया न बदले तब तक उसके चक्कर में न पडें. Bad Service and Lack of " Customer-care" by Centurion Bank of Panjab Credit Card known as Miracle Card







